रुलाने आये….

है तलब की तु फिर इक दफ़ा, इस पागल को रुलाने आये।
मुझे तल्ख़ लहजों से छेड़कर, तु फिर कभी सताने आये।

तेरे दिये जख्म़ भरे तो नहीं, बेहद ही झरफ़ हो गये।
तो कुदेरने इस जख्म़ को तु, फिर कभी मेरे सिरहाने आये।

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गुजरे पल….

गुजरें पल को भुलना मुमकिन तो नहीं है,
उन यादों से उबरना मुमकिन तो नहीं है,

जर्ब-ए-जिस्म चाहे बेशक ही भर जाए,
मगर दिले-जर्ब भरना मुमकिन तो नहीं है…!!

तेरे लबों को….

तेरे लबों को मैं चूम लूँ…ग़र तुम इजाज़त दो मुझे,
तेरी जुल्फों में हाथ फेर लूँ…ग़र तुम इजाज़त दो मुझे…!

ये शाम दिलकश है अभी…अभी हरकतें भी हैं सऩम,
इस दिल में तो बस तुम ही हो… तुम देख लो ना ऐ सनम..!

तेरे रुख़ का मैं दिदार लूँ…. ग़र तुम इजाज़त दो मुझे..
तुझे बाँहो में यूँ सवार लूँ…. ग़र तुम इजाज़त दो मुझे…!!

सियासत की आँधियां…

मसाइब जेरदस्तों के भी सुने जा रहे हैं,
मजहब जाति के जाल भी बुने जा रहे हैं,

अफवाहों की गर्द से मौसम बेरंग है जनाब,
ऐसा लगता है कि फिर से चुनाव आ रहे हैं.!

यह सियासत की आँधियां चल रही है साहब,
जिसमें मजलूमों की बस्तियां उड़े जा रहे हैं,

दर्द से कराह रहे हैं जुग्गी झोपड़ियों के लोग,
ऐसा लगता है कि फिर से चुनाव आ रहे हैं.!

कोई जनेऊ धारी बन रहा तो कोई टोपी धारी,
मजहब के नाम पर वोट भी लिए जा रहे हैं,

रास्तें भी रंगी पड़ी है देखो लहू-ए-इंसानियत से,
ऐसा लगता है कि फिर से चुनाव आ रहे हैं.!!